रांची : नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ (NUSRL), रांची में 20 अप्रैल 2026 को स्टैंडर्ड एसेंशियल पेटेंट्स (SEPs) विषय पर एक राष्ट्रीय सम्मेलन का सफल आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में देशभर के विधि विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और शोधार्थियों ने भाग लिया। सम्मेलन ने डिजिटल युग में बौद्धिक संपदा अधिकार, नवाचार और नियामकीय चुनौतियों पर गंभीर विमर्श का मंच प्रदान किया।
कार्यक्रम की शुरुआत उद्घाटन सत्र से हुई, जिसमें दीप प्रज्वलन और राष्ट्रगान के साथ औपचारिक शुभारंभ किया गया। कुलपति प्रो. (डॉ.) अशोक आर. पाटिल ने स्वागत भाषण में वैश्विक तकनीकी मानकों के निर्माण में SEPs के बढ़ते महत्व पर प्रकाश डाला। मुख्य अतिथि डॉ. जी.आर. राघवेंद्र (वरिष्ठ सलाहकार, डीपीआईआईटी) ने भारत में बौद्धिक संपदा ढांचे को मजबूत करने के प्रयासों पर जोर देते हुए नवाचार और जनहित के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता बताई।
अतिविशिष्ट अतिथि प्रो. (डॉ.) टी. रामकृष्णा (नेशनल लॉ स्कूल, बेंगलुरु) तथा विशिष्ट अतिथि सुरेंद्र शर्मा (एमएसएमई-डीएफओ, रांची) ने भी अपने विचार रखते हुए भारतीय विधिक व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप विकसित करने पर बल दिया।
सम्मेलन के अंतर्गत तीन तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। पहले सत्र की अध्यक्षता डॉ. अपूर्वा दीक्षित के साथ सह अध्यक्ष रिमझिम वैष्णवी ने की, जिसमें भारत के कानूनी और नियामकीय ढांचे, FRAND लाइसेंसिंग, वैश्विक समन्वय और न्यायिक दृष्टिकोण पर चर्चा हुई। दूसरे सत्र की अध्यक्षता डॉ. नीलेश शुक्ला के साथ सह अध्यक्ष डॉ.अविनाश कुमार ने की, जिसमें डिजिटल कॉपीराइट, सतत विकास और इलेक्ट्रिक वाहनों जैसे उभरते क्षेत्रों में SEPs की भूमिका पर विचार किया गया। तीसरे सत्र में डॉ. अंकित श्रीवास्तव की अध्यक्षता एवं अभिनव गुप्ता की सह अध्यक्षता में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, 5G तकनीक और हरित नवाचार जैसे भविष्य उन्मुख विषयों पर चर्चा हुई।
विभिन्न सत्रों में वक्ताओं ने स्पष्ट कानूनी ढांचे और प्रभावी प्रवर्तन तंत्र की आवश्यकता पर जोर दिया, ताकि पेटेंट अधिकारों और प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके। सम्मेलन का समापन डॉ दिवान्शु श्रीवास्तवा ने सर्वश्रेष्ठ शोध पत्र की घोषणा और सेमिनार रिपोर्ट के प्रस्तुतीकरण के साथ की।
यह सम्मेलन भारत के नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र में SEPs की बढ़ती प्रासंगिकता को रेखांकित करता है तथा इस क्षेत्र में निरंतर शैक्षणिक और नीतिगत संवाद की आवश्यकता को दर्शाता है।











