गुरुग्राम :जब एक पिता अपनी ही बेटी को गोली मार देता है, क्योंकि वह अपनी एक स्वतंत्र पहचान बना रही थी, तब यह न सिर्फ एक जघन्य हत्या होती है, बल्कि भारतीय समाज की उस गहरी, विषैली पितृसत्ता की परतें भी उजागर होती हैं, जो स्त्रियों को केवल ‘किसी की बेटी’, ‘किसी की बहन’, या ‘किसी की पत्नी’ तक सीमित देखना चाहती है। गुरुग्राम की राधिका यादव की हत्या किसी एक बेटी की मौत नहीं, बल्कि समाज के वर्जनाओं के पत्थर तोड़कर बनी एक आत्मनिर्भर स्त्री की आकांक्षाओं की हत्या है;यह उस स्त्री की हत्या है,जो अपने नाम, अपनी मेहनत और अपनी पहचान से समाज में जगह बना रही थी।
एक उभरती स्त्री पहचान से भयभीत पुरुष
गुरुग्राम की रहने वाली राधिका यादव टेनिस जगत में तेजी से अपनी पहचान बना रही थीं। उसका दोष इतना ही था कि वह प्रॉपर्टी का अच्छा खासा धंधा करने वाले अपने पिता से ज्यादा धन कमा रही थी। वह आधुनिक भारत की उन लाखों युवतियों में से थीं, जो अपने दम पर कुछ बनने का सपना देखती हैं। लेकिन यही स्वप्न, जब समाज की पारंपरिक पितृसत्तात्मक परंपराओं से टकराता है, तो घर का आंगन भी कब्रगाह में बदल जाता है।
राधिका की हत्या में सबसे त्रासद पहलू यह है कि यह अपराध किसी बाहरी या दुश्मन ने नहीं, बल्कि उसके अपने पिता ने किया। पिता, यानी वह पुरुष, जिसे उसकी सुरक्षा का सबसे पहला दावेदार होना चाहिए था। लेकिन, यही पुरुष उसकी आज़ादी, उसकी सोच और उसकी अस्मिता को बर्दाश्त नहीं कर पाया।
पितृसत्ता को असहनीय होती स्त्री की आज़ादी
भारतीय समाज में बेटियों को अब भी जन्म से ही ‘पराया धन’ मानने की मानसिकता प्रचलित है। वह केवल तब तक स्वीकृत है, जब तक वह पिता या पति की इच्छाओं के अनुरूप जीवन जीती है। जैसे ही वह करियर, पहनावा, विवाह या स्वतंत्र जीवन शैली के संदर्भ में अपने फैसले लेने लगती है, तब समाज के लिए .
रिपोर्ट : संतोष राज पाण्डेय












