रांची :झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रवक्ता सह केंद्रीय सदस्य धीरज दुबे ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 280 देश में वित्त आयोग की स्थापना का प्रावधान करता है। वर्तमान में 15वें वित्त आयोग के तहत करों(Tax) में झारखंड के करदाताओं का 59% हिस्सा केंद्र सरकार को जाता है, लेकिन इसके बदले में राज्य को अपेक्षित संसाधन और सहयोग नहीं मिलता। केंद्र सरकार राज्य के साथ सौतेला व्यवहार करती है।
श्री दुबे ने कई मौकों पर केंद्र सरकार पर “सौतेला व्यवहार” करने का आरोप लगाया है। इसके पीछे मुख्य रूप से निम्नलिखित कारण बताए हैं
निधियों का आवंटन: केंद्र सरकार राज्यों को फंड आवंटन में भेदभाव करती है, खासकर उन राज्यों के साथ जहां भाजपा की सरकार नहीं है। झारखंड जैसे पिछड़े राज्यों को बजट आवंटन में कम हिस्सा मिलता है, जबकि गुजरात जैसे राज्यों को अधिक राशि मिलती है। केंद्र से विभिन्न योजनाओं के तहत मिलने वाले फंड में भी कमी की गई है।
कोयले की रॉयल्टी और अन्य बकाया: केंद्र पर कोयला खनन से संबंधित ₹1.36 लाख करोड़ से अधिक का बकाया है जो वर्तमान में ब्याज सहित 1.40 लाख करोड़ हो गया है। कोयला खनन से हमारे लोग विस्थापित होते हैं, प्रदूषण एवं पलायन का दंश झेलते हैं। कोयला खनन के दौरान होने वाले हादसे में जान गंवाते है। परंतु जब हमारी हिस्सेदारी देने की बात आती है तो केंद्र सरकार इसे रोक कर बैठी हुई है
केंद्रीय योजनाओं में अपर्याप्त सहायता: जल जीवन मिशन जैसी केंद्रीय योजनाओं के लिए केंद्र से अपेक्षित राशि का भुगतान नहीं किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, जल जीवन मिशन के तहत वित्तीय वर्ष 2024-25 में झारखंड को ₹2114 करोड़ से अधिक मिलने थे, लेकिन केवल ₹70 करोड़ ही मिले। झारखंड के आवास का पैसा को रोककर रखा गया। सहयोग करने की बजाय राज्य सरकार को रोकने एवं परेशान करने का भरपूर प्रयास किया।
आपदा प्रबंधन और स्वास्थ्य सेवाओं में कमी: दुबे ने आरोप लगाया है कि कोविड-19 महामारी के दौरान भी केंद्र ने झारखंड के साथ भेदभाव किया। उन्होंने दावा किया कि राज्य ने रेमेडिसिविर, वेंटिलेटर और वैक्सीन की बड़ी मात्रा में मांग की थी, लेकिन उसे बहुत कम आपूर्ति की गई। जबकी राज्यवासियों ने पीएम केयर फंड में भरपूर सहयोग उपलब्ध कराए थे। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने देश में ऑक्सीजन सप्लाई में भरपूर मदद कया था।
केंद्रीय बजट में उपेक्षा: झामुमो ने केंद्रीय बजट 2025-26 को लेकर भी आरोप लगाया है कि इसमें झारखंड और उसके लोगों को “पूरी तरह से नजरअंदाज” किया गया है, जबकि पड़ोसी राज्यों को कई परियोजनाएं मिली हैं। चुनावी लाभ के लिए घोषणाओं की बरसात कर दी गई।
दुबे ने यह भी बताया कि नैतिकता के आधार पर झारखंड वासियों के हक-अधिकार की मांग को लेकर कोई भी भाजपा के सांसद-विधायक गतिशील नहीं है। विगत तीन लोकसभा चुनाव में जनता के अपार समर्थन के बावजूद भी उनके हितों की मांग को लेकर भाजपा नेता शिथिल नजर आते हैं। प्रदेश की भाजपा इकाई नकारात्मक राजनीति में इतनी धंस चुकी है की ना तो इनको जनता की अपेक्षा नजर आती है और ना ही राज्य सरकार द्वारा चलाई जा रही जनहित की योजनाएं।
केंद्र सरकार के 11 साल पूर्ण होने पर प्रदेश की भाजपा इकाई विभिन्न जगहों पर डुगडुगी बजा रही है लेकिन इन 11 सालों में केंद्र सरकार की नोटबंदी, जीएसटी नुकसान, कोरोना महामारी के दौरान कुप्रबंधन तथा ताली-थाली बजवाने, विदेश नीतियों की नाकामी तथा पड़ोसी देश श्रीलंका, बांग्लादेश से रिश्ते बिगड़ने, संघीय ढांचा पर प्रहार, मणिपुर हिंसा, विपक्षी पार्टियों को तोड़ने की साजिश, सूचना का अधिकार को कमजोर करने तथा स्वतंत्र संस्थाओं को प्रभावित करने जैसी घटनाओं पर कुछ नहीं बोल रहे।











