रांची : झारखंड के प्रतिपक्ष नेता बाबूलाल मरांडी ने झारखंड के गवर्नर से मुलाकात कर शराब घोटाले मामले में पत्र शॉप कर सीबीआई जांच की मांग की हैं , उन्होंने कहा है किझारखंड राज्य के 750 करोड़ रुपये से अधिक के शराब घोटाले में ACB को तुरंत चार्जशीट दाखिल करने के लिए निर्देशित करने एवं इस मामले की जाँच में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की संदेहास्पद भूमिका तथा संपूर्ण प्रकरण की जाँच तत्काल सीबीआई को सौंपने के संबंध में।पत्र में जिक्र करते हुए कहा कि झारखंड विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष के रूप में आपका ध्यान राज्य सरकार के उत्पाद विभाग में हुए बहुचर्चित और सुनियोजित शराब घोटाले की ओर आकृष्ट करना चाहता हूँ। यह अत्यंत क्षोभ का विषय है कि राज्य की जाँच एजेंसी, भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB), इस गंभीर आर्थिक अपराध की निष्पक्ष जाँच करने के बजाय सत्ता-संपोषित भ्रष्टाचार को पूर्ण संरक्षण दे रही है। यह स्पष्ट हो चुका है कि एसीबी भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिए साक्ष्यों और वैधानिक समय-सीमा के साथ जानबूझकर समझौता कर रही है।वर्ष 2022 में झारखंड की उत्पाद नीति में बदलाव कर एक सिंडिकेट को फायदा पहुँचाया गया, जिससे राज्य के राजस्व को भारी नुकसान हुआ। शुरुआत में 38 करोड़ रुपये का आंका गया यह घोटाला अब जाँच की परतें खुलने के बाद 750 करोड़ रुपये से अधिक का हो चुका है। इस सुनियोजित लूट में एसीबी की भूमिका तब बेनकाब हुई जब उसने दिखावे के लिए ताबड़तोड़ गिरफ्तारियाँ कीं, लेकिन आरोपियों को कानूनी शिकंजे से बाहर निकालने का पूरा मार्ग भी स्वयं ही प्रशस्त कर दिया। ACB ने 20 मई 2025 को इस घोटाले के मुख्य सूत्रधार, तत्कालीन उत्पाद सचिव आईएएस विनय कुमार चौबे और संयुक्त उत्पाद आयुक्त गजेंद्र सिंह को गिरफ्तार किया। 21 मई 2025 को झारखंड स्टेट बेवरेजेज कॉरपोरेशन लिमिटेड (JSBCL) के महाप्रबंधक (वित्त) सुधीर कुमार दास, पूर्व महाप्रबंधक सुधीर कुमार और प्लेसमेंट एजेंसी के नीरज कुमार को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद अक्टूबर 2025 में महाराष्ट्र और गुजरात से 7 अन्य आरोपियों (जिनमें विपिन परमार, महेश शेडगे, जगन देसाई आदि शामिल थे) की भी गिरफ्तारी हुई।लेकिन इन गिरफ्तारियों के बाद एसीबी ने भ्रष्टाचारियों को बचाने की एक शर्मनाक साजिश रची। 20 मई को गिरफ्तार किए गए गजेंद्र सिंह को महज 56 दिनों के बाद 15 जुलाई 2025 को जमानत मिल गई। इससे भी अधिक गंभीर बात यह रही कि मुख्य आरोपी आईएएस विनय चौबे को 19 अगस्त 2025 को न्यायालय से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 187(2) के तहत डिफॉल्ट बेल (Default Bail) मिल गई। विनय चौबे की तर्ज पर ही अगले दिन, 20 अगस्त 2025 को सुधीर कुमार दास, सुधीर कुमार और नीरज कुमार को भी न्यायालय से जमानत दे दी गई। इन सभी रसूखदार आरोपियों को यह जमानत पूरी तरह से इसलिए मिली क्योंकि एसीबी ने जानबूझकर 90 दिनों की निर्धारित वैधानिक समय-सीमा के भीतर न्यायालय में उनके खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल ही नहीं किया। यह अकाट्य तथ्य सामने आ चुका है कि 8 महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी एसीबी ने इस मामले में एक भी चार्जशीट दाखिल नहीं की है। इसका सीधा परिणाम यह हुआ है कि गिरफ्तार किए गए कुल 17 आरोपियों में से 14 आरोपियों को समय पर चार्जशीट दाखिल न होने के कारण ‘डिफॉल्ट बेल‘ मिल चुकी है।
एसीबी की इसी लचर और मिलीभगत वाली कार्यप्रणाली का एक और ज्वलंत उदाहरण छत्तीसगढ़ के शराब कारोबारी नवीन केडिया का है। जनवरी 2026 में गोवा से गिरफ्तारी के बाद उसे ट्रांजिट बेल मिली, जिसके तुरंत बाद वह पुलिस की आँखों में धूल झोंक कर फरार हो गया और अब तक एसीबी उसकी गिरफ़्तारी सुनिश्चित नहीं कर पाई है। जब राज्य की सर्वाेच्च भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसी स्वयं 90 दिन बीत जाने के बाद भी चार्जशीट दाखिल न करके भ्रष्टाचारियों को सुरक्षित बाहर निकालने का माध्यम बन गई हो, तो उससे किसी भी प्रकार के न्याय की उम्मीद करना बेमानी है। यह स्पष्ट है कि राज्य सरकार के संरक्षण में इस पूरे घोटाले को रफा-दफा करने का प्रयास किया जा रहा है। महामहिम से मेरा दृढ़ और विनम्र अनुरोध है कि आप संविधान के संरक्षक के रूप में इस गंभीर प्रकरण में सीधा हस्तक्षेप करें। ACB को तुरंत चार्जशीट दाखिल करने के लिए निर्देशित करें। राज्य के खजाने की इस सुनियोजित लूट और एसीबी द्वारा आरोपियों को बचाने के लिए रची गई इस साजिश की पूरी जाँच तत्काल प्रभाव से केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को हस्तांतरित करने की अनुशंसा करें, ताकि राज्य की जनता का कानून और व्यवस्था पर विश्वास पुनः स्थापित हो सके और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिल सके।












