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Home » झारखंड में कॉर्पोरेट माफिया का आतंक – अंबा प्रसाद ,एक्स एमएलए !

झारखंड में कॉर्पोरेट माफिया का आतंक – अंबा प्रसाद ,एक्स एमएलए !

पूर्व मंत्री का घर न्यायालय मे मामला लंबित मे भी तोड़ा .

firstreport desk2 by firstreport desk2
7 months ago
in झारखंड, पॉलिटिक्स, रांची
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मेरा परिवार जनप्रतिनिधि के रूप में शुरू से ही विस्थापन, भू-अर्जन में प्रभावित रैयतों के लिए उचित मुआवज़ा एवं पुनर्वास के लिए लड़ता आ रहा है। इसी क्रम में मेरे पिताजी एवं माताजी को झूठे मामले में फंसाकर जेल भेजा गया एवं वे सात-सात साल जेल में रह चुके हैं। मेरे भाई को भी एक साल जेल में रखा गया झूठे मामले बनाकर। यहाँ तक सबको अलग-अलग जेल में रखा गया—पूर्व मंत्री योगेंद्र साव जी, जो मेरे पिता हैं, उनको दुमका जेल में रखा गया, माताजी पूर्व विधायक निर्मला देवी को रामगढ़ जेल में रखा गया और मेरे छोटे भाई को हजारीबाग जेल में रखा गया। राज्य-बदर भी माता-पिता को किया गया। जितना संघर्ष हमारे परिवार ने किया विस्थापन की लड़ाई में, उतना संघर्ष और कुर्बानी झारखंड में किसी ने नहीं की होगी।इस मामले में राज्य एवं केंद्र सरकार उदासीन है और कंपनियाँ जैसे कि NTPC, CCL, Adani आदि, ये लोग कॉर्पोरेट माफिया बन चुके हैं और प्रशासन के साथ मिलकर तरह-तरह से रैयतों को परेशान कर रहे हैं एवं उचित मुआवज़ा एवं पुनर्वास से वंचित करते आ रहे हैं।उच्च न्यायालय में मुआवज़ा एवं पुनर्वास के लिए काफी मामले लंबित हैं और कुछ मामलों में माननीय उच्च न्यायालय आदेश जारी कर रहे हैं कि वे कुछ नहीं कर सकते, आप वापस सक्षम पदाधिकारी के पास जाइए। आपको लगता होगा कि यह एक मनगढ़ंत कहानी है क्योंकि कल-परसों मेरा घर तोड़ दिया है, इसलिए आज मैं बोल रही हूँ। अब लीजिए, मैं आप लोगों को दस्तावेज़ के साथ प्रमाण दे रही हूँ। ये मामला संख्या WP(C) No. 3579/2023 और 5012/23, 6969/2023, 717/24 और 6561/24 कुल 5 केस का एक जजमेंट और WP(C) No. 1670/2025, ये टोटल 6 केस का High Court का जजमेंट मैं आपको दे रही हूँ जिसमें कुल प्रभावित रैयतों की संख्या 83 है। इन्होंने CBA Act की जगह पर RFCTLARR 2013 Act के कानून के तहत मुआवज़ा की माँग हाईकोर्ट से की थी, जो जायज़ माँग है।चूंकि इनकी ज़मीन भले ही 2015 से पहले अर्जित की गई थी, परंतु 2025 तक इनमें से किसी को मुआवज़ा नहीं दिया गया। यह भारत का राजपत्र है जो कहता है कि अगर 2015 तक मुआवज़ा का भुगतान नहीं हुआ, तो RFCTLARR 2013 कानून के तहत मुआवज़ा निर्धारण होगा। अब आते हैं उच्च न्यायालय के इस निर्णय के ऊपर जहाँ उच्च न्यायालय कहती है कि मेरे पास मत आइए, सक्षम पदाधिकारी के पास जाइए; और कौन हैं ये सक्षम पदाधिकारी, वो भी नहीं लिखा। हमारे हिसाब से नए कानून में सक्षम पदाधिकारी 2013 कानून के हिसाब से DC हैं।DC के पास जाते हैं, आवेदन देते हैं, तो कोई सुनवाई नहीं होती है और उच्च न्यायालय भी यह घोषित नहीं करती है कि हमें मुआवज़ा दिलाने का काम DC करेंगे। अब रैयत कहाँ जाए? जिनके पास पैसे थे, वे तो ऑर्डर ले आए, जिनके पास पैसे नहीं हैं वे हाईकोर्ट नहीं जा पाए; और जाकर भी क्या फायदा? जिस राज्य में अंधी-गूँगी सरकार हो और उच्च न्यायालय इस तरह का आदेश पारित करता हो कि हम सुप्रीम कोर्ट भी न जा पाएँ, तो रैयत कहाँ जाए?आप संविधान के चौथे स्तंभ हैं, आप ही बताइए कि संविधान के बाकी तीन स्तंभ अगर इस तरीके से काम करें तो यह संविधान की फेलियर है कि नहीं है? यह कॉन्स्टिट्यूशन की फेलियर है कि नहीं? क्या गलत बोलते हैं राहुल गांधी  कि संविधान मर रहा है? यह क्या है? संविधान मर रहा है कि नहीं? अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 की धज्जियाँ उड़ रही हैं कि नहीं?अब आते हैं हम अपने मामले में। जिस मकान को 2 दिन पहले आपने NTPC के द्वारा 2000 पुलिस फोर्स का सहारा लेकर तोड़ते हुए देखा है, उस सिलसिले में आपको बताते हैं कि यह दूसरी तबाही है। पहली तबाही 01/08/25 को हुई थी, जब पूर्व मंत्री योगेंद्र साव जी के कारखाने ‘लक्ष्मण सिरामिक’ को NTPC द्वारा ज़बरन ज़मींदोज़ करते हुए देखा गया। आइए उसकी भी कहानी बताते हैं। यह जो ज़मीन है, उससे संबंधित एक केस मुआवज़ा हेतु NTPC ने खुद दर्ज कराया है मेरे पिताजी के खिलाफ; यही वो केस है, इसका केस संख्या—CB रेफरेंस 57/25 है। ये पेपर मैं आपको देती हूँ, आप लोग खुद अनुसंधान कर लीजिए कि क्या है इस केस में। और ये एक केस है WP(C) संख्या 5483/25, यह मेरे पिताजी ने किया है हाईकोर्ट में NTPC के खिलाफ 2013 कानून के हिसाब से मुआवज़ा माँग करने हेतु। अब ये दो केस बारी-बारी चल रहे हैं, लंबित हैं न्यायालय में।अब बात आती है ज़मीन अधिग्रहण की। हम नहीं बोल रहे हैं, NTPC बोल रहा है कि भूमि अधिग्रहण 24/06/2008 में हुई है, तो मुआवज़ा निर्धारण के लिए हमें पहली बार 30-05-2025 को बुलाया गया, फिर दूसरी बार 10-06-25 को बुलाया, फिर तीसरी बार 20-06-25 को बुलाया और सभी नोटिस में CBA अधिनियम के तहत मुआवज़ा के लिए नोटिस दिए। क्या उन्हें पता नहीं कि हम पर 2013 कानून लागू होता है? क्योंकि आप पहली बार 2015 के बाद 2025 में हम लोगों को नोटिस कर रहे हैं। हमने इसका विरोध किया तो NTPC ने भवन निर्माण विभाग से गैर-कानूनी रूप से हमारे कारखाने और मकान का मुआवज़ा राशि निर्धारण करवाया और भवन निर्माण विभाग के प्रतिवेदन के आधार पर मुआवज़ा निर्धारण करते हुए हमें एक आखिरी नोटिस दिया 12/07/25 को, यह कहते हुए कि आपके खिलाफ CBA ट्रिब्यूनल में मामला दाखिल किया गया है, उसका चेक ले लीजिए। देखिए वही वो चिट्ठी है 12/07/2025 की।
16/07/25 को केस दर्ज कर दिया। हमें नोटिस मिला, हम 24/07/2025 को कोर्ट में हाज़िर हो गए। देख लीजिए ऑर्डर शीट है कोर्ट का, कुछ भी हम बिना दस्तावेज़ के नहीं बोल रहे हैं। 13/10/25 को हम विरोध के साथ चेक रिसीव करने गए और यहीं से कहानी में ट्विस्ट आता है।ठीक उसी दिन 13/10/25 को NTPC ने कोर्ट में एक आवेदन दिया। यही वो आवेदन है, सब कोर्ट के ही रिकॉर्ड की सर्टिफाइड कॉपी है। इसमें उन्होंने दो प्रार्थनाएँ की हैं कोर्ट से: हमें तब तक मुआवज़ा का चेक न दिया जाए जब तक हम NTPC को कब्ज़ा नहीं दिलाते हैं, और दूसरा तो और मज़ेदार है कि वे कोर्ट को बोल रहे हैं कि हम NTPC के खिलाफ हजारीबाग कोर्ट में जो आपराधिक मामला दर्ज किए हैं, उसको भी हम वापस ले लें, तो उसके बाद चेक दिया जाए। तो अब आप समझे कि इनकी मंशा क्या है? मुआवज़ा न देने की।बाद चेक दिया जाए। तो अब आप समझे कि इनकी मंशा क्या है? मुआवज़ा न देने की।13/10/25 को NTPC का जवाब देने के लिए हमें समय दिया गया, इस आवेदन पर अभी सुनवाई नहीं हुई है। ट्रिब्यूनल कोर्ट में NTPC ने पहले एक बार छुपाया कि उन्होंने हमारा कारखाना 01/08/25 को ही बुलडोज़ कर दिया था।14/03/26 को मेरे पिताजी ने WP(C)-5483/2026 में माननीय उच्च न्यायालय में IA संख्या 540/26 दाखिल की, यह कहते हुए कि NTPC बिना मुआवज़ा दिए ज़बरन कब्ज़ा करना चाह रही है, इस पर हाईकोर्ट स्टे दे। और जैसे ही 14/03/26 तारीख को इस IA संख्या 540/26 के आवेदन की कॉपी NTPC को जवाब देने के लिए मिलती है, वैसे ही 19/03/26 को मेरे पिताजी की अनुपस्थिति में 2000 फोर्स के साथ ज़ोर-ज़बरदस्ती से हमारे घर को तोड़ने पहुँच गए। उस समय माता निर्मला देवी जी, जो भूतपूर्व विधायक हैं, उनके साथ एक महिला थी। इन लोगों को नाइटी पहने हुए अवस्था में, फोन छीनकर, नंगे पैर पुलिस ने गाड़ी में बैठाकर थाना ले जाकर बंद कर दिया। नाश्ता भी नहीं करने दिया गया, न ही कोई सामान लेने दिया गया।घर के सभी कीमती सामान, रुपया-पैसा, ज़ेवरात आदि जो कुछ भी था, उसे निकालने नहीं दिया गया और बुलडोज़र से घर को ज़मींदोज़ कर दिया गया। जिससे हमारा लगभग 20-30 लाख रुपये का नुकसान हुआ है। नकदी का पता नहीं चल पाया, बाकी घरेलू सामान जो टूटा हुआ था हमने इकट्ठा किया, उसे भी पुलिस उठाकर ले गई। हम करीब एक बजे पहुँचे तब तक मकान गिर चुका था, मेरे पिताजी दिल्ली में थे।यह सिलसिलेवार घटना आपको बताई है, यह कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं है। यह NTPC का काला सच है और रैयतों के लिए यह काला दिवस है। बिना मुआवज़ा दिए घर, मकान, कारखाना को तोड़कर NTPC जनता को यह दिखाना चाहती है कि अगर तुम्हारे नेता का यह हाल कर सकते हैं, तो तुम्हारा क्या करेंगे? यह NTPC के द्वारा एक थ्रेट मैसेज है और न्यायालय की अवहेलना व दुरुपयोग भी है।ये न तो High Court को कुछ समझते हैं, न ही ट्रिब्यूनल कोर्ट को कुछ समझते हैं। हमारे प्रशासनिक पदाधिकारी, पुलिस पदाधिकारी और सरकार भी NTPC की जेब में रहते हैं, नहीं तो इतना दुस्साहस कि मामला जब कोर्ट में लंबित है तो आप ऐसा काम कर रहे हैं?क्या उच्च न्यायालय या ट्रिब्यूनल कोर्ट ने NTPC या प्रशासन को ऐसा आदेश दिया है कि हमारे घर, कारखाने या हमारे मकान को ज़बरन ढा दिया जाए? अगर है, तो जैसे हम अपने सारे न्यायालय के कागज़ातों के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं, वे भी प्रेस कॉन्फ्रेंस करके ऐसा कागज़ दिखाएँ कि हाईकोर्ट और ट्रिब्यूनल कोर्ट ने उन्हें हमारे मकान या कारखाने को ज़बरन तोड़ने का आदेश दिया है।मेरा सवाल जनता से है और मीडिया से भी है, जो संविधान के चौथे स्तंभ हैं, कि क्या यह राज्य जल-जंगल-ज़मीन के अधिकार के लिए बना है? क्या यह ‘अबुआ राज’ है या ‘बाबुओं का राज’ है?
Tags: #Terror#f corporate mafia #Jharkhand - Amba Prasadex-MLA!
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