रांची: नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ (NUSRL), रांची के सेंटर फॉर स्टडी एंड रिसर्च इन ट्राइबल राइट्स द्वारा सरहुल की पूर्व संध्या पर एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में वरिष्ठ लेखक, कवि एवं समाज सुधारक महादेव टोप्पो मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे, जबकि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. (डॉ.) अशोक आर. पाटिल विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहे।
कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक स्वागत गान एवं दीप प्रज्वलन के साथ हुई। छात्रों ने सरहुल के महत्व और समाज में उसकी भूमिका पर अपने विचार साझा किए साथ ही, बाहा पर्व के इतिहास, परंपरा और महत्व को दर्शाते हुए एक छात्रों ने नाटक का मंचन भी किया गया।
कुलपति प्रो. (डॉ.) अशोक आर. पाटिल ने अपने संबोधन में सरहुल के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि आदिवासी समाज अपनी संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखेगा, तो आने वाली पीढ़ियां प्रकृति के महत्व को बेहतर ढंग से समझ पाएंगी। उन्होंने यह भी बताया कि विश्वविद्यालय विभिन्न सेंटर और समितियों के माध्यम से छात्रों को समाज और प्रकृति से जुड़े मुद्दों के प्रति जागरूक कर रहा है तथा ग्रामीण समस्याओं के समाधान के लिए निरंतर प्रयासरत है।
मुख्य अतिथि महादेव टोप्पो ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि यह उनके लिए पहला अवसर है जब वे किसी विधि विश्वविद्यालय में इस प्रकार के कार्यक्रम में शामिल हुए हैं। उन्होंने खुशी व्यक्त करते हुए कहा कि कानून के छात्र अपने अधिकारों और प्रकृति के साथ संबंध को लेकर जागरूक हैं। उन्होंने आदिवासी समाज के प्रकृति से गहरे जुड़ाव को रेखांकित करते हुए कहा कि आदिवासी समाज का प्रत्येक त्योहार प्रकृति से जुड़ा होता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि जंगल से लकड़ी काटने से पहले भी आदिवासी प्रकृति को प्रणाम करते हैं और जंगल से फल तोड़ते समय भी अन्य जीव-जंतुओं के अधिकारों का ध्यान रखते हैं।
महादेव टोप्पो ने अपनी कुछ कविताएं भी प्रस्तुत कीं, जिनके माध्यम से उन्होंने आदिवासी जीवन, प्रकृति और पारंपरिक समय-चक्र की विशेषताओं को समझाया। उन्होंने छात्रों से मौसम आधारित पारंपरिक त्योहारों को मनाने की अपील की, ताकि ये परंपराएं पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रहें। कार्यक्रम के समापन से पूर्व महादेव टोप्पो ने ‘विश्वरंग संवाद’ पत्रिका के आदिवासी विशेषांक को कुलपति को भेंट किया और इसे विश्वविद्यालय पुस्तकालय में स्थान देने का अनुरोध किया।
अंत में धन्यवाद ज्ञापन असिस्टेंट प्रोफेसर रामचंद्र उरांव ने किया। उन्होंने प्रकृति और आदिवासी समाज के गहरे संबंध पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आदिवासी संस्कृति सदियों से प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। उन्होंने मुख्य अतिथि के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय उनके मार्गदर्शन पर आगे बढ़ने के लिए प्रतिबद्ध है।
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