रांची: बिरला प्रौद्योगिकी संस्थान, मेसरा में तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला “जड़ों से नवजागरण: झारखंड में जनजातीय विरासत, नवाचार और डिजिटल उद्यमिता को जोड़ने की पहल” का शुभारंभ 6 मार्च को हुआ। यह कार्यशाला 8 मार्च तक चलेगी। इसका उद्देश्य जनजातीय विरासत के प्रति जागरूकता बढ़ाना और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक तकनीक तथा डिजिटल उद्यमिता के साथ जोड़ने के तरीकों पर चर्चा करना है।
कार्यशाला का उद्घाटन सत्र सुबह 9:00 बजे आयोजित किया गया, जिसमें राज्य भर से कई सम्मानित अतिथि और शिक्षाविद शामिल हुए। इस अवसर पर पद्मश्री से सम्मानित मधु मंसूरी हँसमुख मुख अतिथिमुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उनके साथ कला एवं संस्कृति विभाग में निदेशक आसिफ अकरम भी मौजूद थे।
कार्यक्रम में विभागाध्यक्ष डॉ. संजय झा,डॉ. निशिकांत दुबे और डॉ. मृणाल पाठक सहित कई प्रसिद्ध कलाकार और शोधकर्ता भी शामिल हुए, जिन्होंने जनजातीय संस्कृति को सहेजने और आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान विभाग की प्रोफेसर अनुष्का और ऐत्रयी ने उद्घाटन सत्र की मेजबानी की।
सभा को संबोधित करते हुए मधु मंसूरी हँसमुख ने युवाओं को अपनी जड़ों से जुड़ने और स्थानीय जनजातीय परंपराओं की समृद्धि को समझने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने अपने जीवन के अनुभव और संघर्षों की कहानियां साझा करते हुए छात्रों को अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने अपने प्रसिद्ध गीत झारखंड के कोरा का भी उल्लेख किया, जो झारखंड की भावना और विरासत को दर्शाता है।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि आसिफ अकरम ने अपने संबोधन में जनजातीय सांस्कृतिक व्यवस्था को मजबूत करने और पारंपरिक ज्ञान को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) जैसी नई तकनीकों से जोड़ने की जरूरत पर प्रकाश डाला। उन्होंने छात्रों और शोधकर्ताओं को ऐसे नए विचार विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया जो सांस्कृतिक विरासत और डिजिटल तकनीक को साथ लेकर आगे बढ़ें।
इस कार्यशाला में झारखंड के विभिन्न शिक्षण संस्थानों से छात्र और शिक्षक शामिल हुए।
प्रतिभागियों ने कई व्यावहारिक सत्रों और प्रदर्शनों में भाग लिया, जिनमें जनजातीय कला और समुदाय की परंपराओं को करीब से समझने का अवसर मिला।
इन गतिविधियों में सोहराय कला पेंटिंग, मानव चेहरे के मास्क बनाना, और मिट्टी के बर्तन बनाना जैसे सत्र शामिल थे। इसमें प्रतिभागियों ने पारंपरिक तरीकों से मिट्टी के बर्तन बनाए, प्राकृतिक मिट्टी तैयार करने की प्रक्रिया देखी और जनजातीय भोजन परंपराओं पर चर्चा भी की। ये कार्यशालाएं जनजातीय कलाकारों द्वारा संचालित की गईं, जो अपने-अपने कला रूपों के अनुभवी कलाकार हैं। इससे प्रतिभागियों को सीधे समुदाय के ज्ञान से सीखने का अवसर मिला।
कार्यक्रम के प्लेनरी सत्रों में यह चर्चा की गई कि डिजिटल टूल्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस किस तरह जनजातीय ज्ञान को दर्ज करने और संरक्षित करने में मदद कर सकते हैं।
इस दौरान डॉ. मनीषा उरांव ने एक महत्वपूर्ण व्याख्यान दिया, जिसमें उन्होंने महुआ, दुरैंता और जुहू जैसे पारंपरिक खाद्य पदार्थों के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इनका जनजातीय समाज में औषधीय और आर्थिक दोनों तरह का महत्व है।
दूसरा प्लेनरी सत्र डॉ. सोमनाथ बी. सामंतराय बसु मलिक द्वारा लिया गया। उन्होंने पारंपरिक जनजातीय ज्ञान को आधुनिक शोध और नवाचार के साथ जोड़ने की संभावनाओं पर चर्चा की और बताया कि डिजिटल तकनीक इस ज्ञान को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
दिन का समापन एक रंगारंग सांस्कृतिक संध्या के साथ हुआ, जिसमें राज्य के विभिन्न हिस्सों से आए कलाकारों ने पारंपरिक झूमर नृत्य प्रस्तुत किया। इस प्रस्तुति ने झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता को दर्शाया।
कार्यक्रम के आयोजन में संकाय सदस्यों डॉ. मृणाल पाठक,डॉ. निशिकांत दुबे और कई छात्र स्वयंसेवकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसके कारण कार्यक्रम सफलतापूर्वक आयोजित हो सका।
यह कार्यशाला अगले दो दिनों तक जारी रहेगी, जिसमें और भी इंटरएक्टिव सत्र, चर्चा और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इनका उद्देश्य जनजातीय परंपराओं और आधुनिक तकनीकी प्रगति के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना है।
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