बड़कागांव :जैसा कि आप जानते हैं, मैं कुछ दिन पहले एक कानूनी मुद्दा उजागर की थी, जिसमें अभी झारखंड में एवं पूरे देश में FIR के ऑनलाइन फॉर्म में धड़ल्ले से 154 CrPC जैसे मृत कानून का इस्तेमाल हो रहा है, जबकि देश में 01/07/2024 से ही BNSS लागू है। मुझे लगता है कि मेरे प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद भी इसमें सुधार नहीं हुआ है, जबकि देशभर के मीडिया एवं न्यूज़ एजेंसियों ने भी इस मुद्दे को मेरे प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद उजागर किया। इस बात के लिए मैं मीडिया की आभारी हूँ।
आज फिर मैं आप प्रेस मीडिया के सामने एक और मुद्दा लेकर आई हूँ जो कानून और व्यवस्था से संबंधित है। जैसा कि आप जानते हैं कि हमारे राज्य में गृह मंत्रालय एवं उद्योग मंत्रालय हमारे मुख्यमंत्री महोदय के ही अधीन चलते हैं। राज्य में उच्च न्यायालय भी है एवं देश में सर्वोच्च न्यायालय है। जिलों में IPS एवं IAS अधिकारियों की कमी नहीं है, ये सभी पढ़े-लिखे प्रबुद्ध लोग हैं एवं बुद्धिजीवियों में गिने जाते हैं।
अब आप जरा केरेडारी थाना कांड संख्या 13/2026, 25/1/2026 पर गौर फरमाइए। यही वो FIR है जिसमें कॉलम संख्या 2 में आपको दिखाई देगा कि अपराध संख्या 6 में कोई अपराध वर्णित नहीं है और क्रम संख्या 7 से लेकर 15 तक में जिन धाराओं को अपराध कहकर दर्शाया गया है, वे सारी ‘औद्योगिक विवाद अधिनियम’ (Industrial Dispute Act) की धाराएं हैं, जिन्हें FIR में दर्ज किया गया है। राज्य पुलिस को यह नहीं पता है कि औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत FIR दर्ज नहीं हो सकती है। औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत कांड का विचारण (Trial) करने की क्षमता आपराधिक न्यायालय को नहीं है, बल्कि यह अधिकार लेबर कोर्ट (Labour Court), लेबर कमिश्नर एवं इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल को है।
पुलिस के या तो सामान्य ज्ञान में बेहद कमी है या फिर पुलिस ‘कॉर्पोरेट सिंडिकेट’ बन गई है। ये तनख्वाह पब्लिक मनी (Public Money) से लेते हैं और काम कंपनी का करते हैं। ऐसे थाना प्रभारी और पुलिस अधीक्षक के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं होती है, बल्कि उन्हें संरक्षण मिलता है। इन तथाकथित ‘काबिल’ अफसरों से जनता परेशान है। मेरे प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से मैं गृह मंत्रालय और उद्योग मंत्रालय को यह संदेश देना चाहती हूँ कि राज्य में औद्योगिक विकास होना चाहिए, परंतु कानून-व्यवस्था दांव पर लगाकर नहीं।
पुलिस के पास या तो कानून का प्रारंभिक ज्ञान (Elementary Knowledge) नहीं है या फिर वह यह सब जानबूझकर कर रही है। दोनों ही स्थितियों में पुलिस जनता की हितकारी तो नहीं दिख रही है। क्या हम भारत के नागरिक नहीं हैं? क्या हमारे लिए अलग से कानून बना है? क्या वर्तमान केरेडारी के थाना प्रभारी और वर्तमान हजारीबाग जिला के पुलिस अधीक्षक इस पद पर रहने लायक हैं? क्या उन्हें हटाया नहीं जाना चाहिए?
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रांची : 10 फरवरी झारखंड में राज्य के खजाने से करीब 10,000 करोड़ रुपये के कथित तौर पर गायब होने...












